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एक गिरगिट का सपना/ मोहन राकेश

एक गिरगिट का सपना            लेखक: मोहन राकेश  एक गिरगिट हरे जंगल में रहता था। उसके लिए वह बहुत अच्छी जगह थी। वहाँ उसे भरपूर खाना-पीना मिलता था। फिर भी वह उदास रहता था। क्योंकि, उसका अपना कोई रंग नहीं था। वह हर पल बदलता रहता—हरा, नीला, पीला, काला। लगता, उसकी कोई पहचान ही नहीं। वह हर जीव से ईर्ष्या करता। पास के साँप की खूबसूरत खाल देखकर सोचता—काश! मैं साँप होता! मैं साँप की तरह ही रेंगता, फन उठाता, मुझसे सब डरते। एक रात बदहजमी से उसे नींद नहीं आई। उसके एक दोस्त ने उसे नींद की पत्ती दी। खाई तो उसे गहरी नींद आई और अजीब सपना शुरू हुआ। सपने में वह साँप बन गया था। फन उठाया, रेंगा, बहुत खुश हुआ। लेकिन नेवला लपका। रंग नहीं बदल सका, डरकर छिपा। सोचा—काश नेवला होता! तो नेवला बन गया। उछला-कूदा, लेकिन काँटे में फँस गया। सोचा—काश पेड़ की टहनी होता! तो टहनी बन गया। हवा में झूलने लगा। फिर कौवे आए, चोंच मारी। सोचा—काश कौवा होता! तो कौवा बन गया। उड़ चला, आसमान में कई चक्कर लगाए। लेकिन नीचे लड़के गुलेल लिए निशाना साधने लगे। वह डर के मारे चिल्ला उठा। तभी अचानक उसकी आँ...

छिप-छिप अश्रु बहाने वालो/ कवि: गोपालदास "नीरज"

छिप-छिप अश्रु बहाने वालो           कवि: गोपालदास "नीरज" छिप-छिप अश्रु बहाने वालो, मोती व्यर्थ लुटाने वालो कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है। सपना क्या है, नयन सेज पर सोया हुआ आँख का पानी और टूटना है उसका ज्यों जागे कच्ची नींद जवानी गीली उमर बनाने वालो, डूबे बिना नहाने वालो कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है। कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है। माला बिखर गयी तो क्या है खुद ही हल हो गयी समस्या आँसू गर नीलाम हुए तो समझो पूरी हुई तपस्या रूठे दिवस मनाने वालो, फटी कमीज़ सिलाने वालो कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है। कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है। खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर केवल जिल्द बदलती पोथी जैसे रात उतार चाँदनी  पहने सुबह धूप की धोती वस्त्र बदलकर आने वालो! चाल बदलकर जाने वालो! चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है। कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है। लाखों बार गगरियाँ फूटीं, शिकन न आई पनघट पर, लाखों बार किश्तियाँ डूबीं, चहल-पहल वही है तट पर, तम की उमर बढ़ाने वालो! लौ की ...